कोविड 19 के दौरान देखभाल करने वाले की करें परवाह

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-कभी और वह भी एकदम अकस्‍मात ही हमें सीधे तौर पर मानवता की सेवा करने का बहुमूल्‍य अवसर मिलता है। ‘सार्स-कोव-2 (@ कोविड-19)’ पूरे विश्व के लिए न केवल एक जीवनपर्यंत अनुभव है, बल्कि एक बिल्‍कुल भिन्‍न युग जैसा अनुभव है। इस महामारी ने हमें यह अहसास करा दिया है कि हम सभी सही मायनों में कितने असुरक्षित हैं। इतना ही नहीं, महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग एवं पशु तो और भी अधिक असुरक्षित हैं। एक और खास बात यह है कि इस तरह के संकट की घड़ी में ही यह पता चलता है कि किसमें कितना प्रशासनिक कौशल/क्षमता है। हमसे काफी उम्‍मीदें रखने वालों की आवश्‍यकताओं को हम कितनी तेजी से और कितने सटीक तरीके से पूरा करते हैं वही असली ‘मंत्र’ है। भारत सरकार का हमारा महिला और बाल विकास मंत्रालय भी हमारे समाज की आधारशिला यानी महिलाओं और बच्चों को आवश्‍यक संबल एवं मजबूती प्रदान करने के लिए अपनी ओर से अथक कोशिश कर रहा है।

कोविड-19 महामारी के संकट के कारण किए गए लॉकडाउन ने हम सभी को अपने-अपने घरों में कैद कर दिया है और इसके साथ ही यह अहसास करा दिया है कि जहां तक संभव हो, झाड़ू-पोछा लगाने, साफ-सफाई करने और खाना पकाने जैसी बुनियादी आवश्यकताओं का हमें ही स्वयं ध्यान रखना चाहिए। हम सभी को यह भी ध्‍यान में रखना चाहिए कि हमारे घर पर काम करने वालों/कामवाली को भी अपने परिवार के साथ लंबे समय तक आराम करने और समय बिताने का मौका मिलना चाहिए। हम सभी को अपने घर पर काम करने वालों/कामवाली के प्रति अधिक संवेदनशील, सहानुभूतिपूर्ण एवं आभारी होना चाहिए। हालांकि, इसके बावजूद इनमें से कई लोगों को इस दौरान भारी हानि उठानी पड़ी है क्‍योंकि उनके नियोक्ताओं ने उन्हें दो माह से भी अधिक अवधि का कोई भुगतान नहीं किया है। पूरी दुनिया को जीवन में ‘पारस्‍परिक रूप से निर्भर संबंधों’ की सराहना और सम्मान करना सीखना होगा।

इस दौरान जहां एक ओर माता-पिता दोनों को ही इतने लंबे समय के बाद अपने बच्चों के साथ घर पर ज्‍यादा समय बिताने का अवसर मिला (क्योंकि स्कूल भी बंद थे) और पारिवारिक लगाव मजबूत हुआ तथा बच्चों को माता-पिता दोनों के ही द्वारा बनाए गए भोजन का लुत्‍फ उठाने का अवसर मिला, वहीं दूसरी ओर कई ऐसे परिवार भी हैं जिनके पास एक साथ खाना खाने के लिए कुछ दिनों तक कुछ भी नहीं था और उनकी पहुंच भी ‘ऑनलाइन स्कूली शिक्षा’ तक नहीं है।

हम इस कटु सच्‍चाई पर अपनी आंखें नहीं मूंद सकते हैं कि जब अनिच्छुक विवाहित जोड़ों को एक साथ घर पर बंद रहने के लिए विवश कर दिया जाता है, तो निराशा, क्रोध, झड़प, झगड़े जैसी भावनात्मक उथल-पुथल का होना स्‍वाभाविक है। इसकी संभावना रहती है और यह सामान्य स्थिति भी है। हालांकि, समस्या तब गंभीर हो जाती है जब कोई व्यक्ति अपने नकारात्मक विचारों को नियंत्रित रखने में समर्थ नहीं हो पाता है और अन्य लोगों की प्रतिष्‍ठा का सम्मान नहीं करता है तथा शारीरिक रूप से कमजोर लोगों पर आक्रामक तरीके से हमला कर बैठता है। ऐसी स्थिति में घर पर रहने वाले बच्चे अपने से बड़ों का यह अजीब व्यवहार देखते हैं और इसे सामान्‍य स्थिति ही मानने लगते हैं तथा आने वाले समय में वह भी ठीक इसी तरह से अमानवीय व्‍यवहार करने लग जाते हैं।

ऐसे कई काम हैं जिनका मिलकर लुत्फ उठाया गया, जिनमें एक नई भाषा या एक संगीत वाद्य यंत्र सीखना, फिल्म देखना, रेडियो सुनना, अपने बच्चों की पढ़ाई में सहायता करना शामिल हैं। हालांकि ऐसे घृणायोग्य (या निर्लज्ज) लोग भी हैं, जिन्होंने इस समय को अपने जीवन साथी और बच्चों पर हिंसा करने में बिताया।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय इस अप्रत्याशित दौर में महिलाओं और बच्चों की सहायता करने की कोशिश कर रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि महिलाएं हमेशा से ही कई कार्यों को एक साथ करने वाली, घर और कार्य स्थल दोनों का अच्छी तरह से प्रबंधन करने वाली रही हैं। लेकिन नए सामान्य चलन “वर्क फ्रॉम होम” के साथ कार्य के इस असमान बोझ के साथ इन राष्ट्र निर्माताओं की देखभाल की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ गई है।
यदि लॉकडाउन की अवधि के दौरान घरेलू हिंसा और अनचाही गर्भावस्था के मामले बढ़ जाते हैं तो हमारी व्यवस्था इससे सुगमता और प्रभावी रूप से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है।
681 वन स्टॉप केन्द्र (ओएससी) या साक्षी केन्द्र, 32 राज्यों/ संघ शासित क्षेत्रों में महिला हैल्पलाइन-181, ईआरएसएस (आपात प्रक्रिया सहयोग प्रणाली)- 112 परिचालन में हैं, जो पुलिस की सुविधा, स्वास्थ्य और कानूनी सहायता, मनो-सामाजिक परामर्श और अस्थायी आश्रय सहित एकीकृत रूप से कई सेवाएं उपलब्ध कराती हैं। इस लॉकडाउन के दौरान इनके माध्यम से अभी तक 36,000 से भी अधिक महिलाओं को सहायता दी गई है।
उज्ज्वला, स्वाधार होम्स, बाल देखभाल संस्थानों को कोविड के खिलाफ लड़ाई के लिए जरूरी साबुन, सैनिटाइजर और मास्क जैसी बुनियादी सामग्रियों के साथ नियमित रूप से चलाया जा रहा है।
महिलाओं के मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता पर जोर दिया गया है और देश भर में लगभग 6,318 जन औषधि केन्द्रों पर सब्सिडी युक्त 1 रुपये प्रति पैड के किफायती मूल्य पर “सुविधा” सैनिटरी नैपकिन सहित 40 महिला केन्द्रित उत्पाद उपलब्ध कराए जा रहे हैं। वन स्टॉप केन्द्र इसके लिए उनके साथ सामंजस्य बिठाकर काम कर रहे हैं।
टेक होम राशन (टीएचआर) गर्भवती महिलाओं और बच्चों को घर पर ही वितरित किया गया है। ऐसा महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की रीढ़ माने जाने वाले आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी सहायकों के माध्यम से किया गया है। इससे जुड़े जोखिम की परवाह किए बिना वे कोविड-19 के प्रसार की रोकथाम में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इन कोविड योद्धाओं पर हमें गर्व है और उन्हें हमारी तरफ से दिल से सलाम।
महिलाओं की सुरक्षा एवं कल्याण और प्रवासी महिला मजदूरों की मासिक धर्म स्वच्छता पर बहुत से वेबिनार और वीडियो कॉन्फ्रेंस आयोजित किए गए हैं। हम इस तथ्य पर भी ज़ोर देते हैं कि पुरुष प्रतिभागियों और छात्रों के साथ ऐसे बहुत सारे और वेबिनार आयोजित किए जाने चाहिए ताकि उन्हें इस बारे में सही तरीके से संवेदनशील किया जा सके क्योंकि ज्यादा विविध और समावेशी वातावरण बनाने के लिए उन्हें प्रशिक्षण देना बहुत जरूरी है और उन प्रतिभागियों को “संघर्ष समाधान” के बारे में समझाया जा सके।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुरोध पर कई संस्थानों द्वारा लॉकडाउन के दौरान कई हेल्पलाइन नंबरों को सक्रिय किया गया है, जो इस प्रकार हैं – एनसीडब्ल्यू (7217735372), एनआईएमएचएएनएस, बैंगलोर (080-46110007), आईएचबीएएस, दिल्ली (011-22574820 / 9869396824), एनएएलएसए का लीगल एड (15100)।

इसके अलावा, प्रत्येक राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों के लिए समर्पित नोडल अधिकारी नामित किए गए हैं ताकि हमारा “सहकारी संघवाद” बिना रुकावट बरकरार रहे।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय मोबाइल ओएससी, मोबाइल आंगनवाड़ियों और मोबाइल ओपन शेल्टरों के विचार को आगे बढ़ा रहा है और तमाम सामाजिक दूरी के उपायों और सुरक्षा मानकों को उचित स्थान पर बरकरार रखते हुए प्रवासी मज़दूरों, खासकर महिलाओं और बच्चों के लिए विस्तारित आउटरीच सेवाओं के तौर पर 13.8 लाख आंगनवाड़ी केंद्रों का उपयोग कर रहा है। आरडब्ल्यूए, पंचायती राज संस्थानों और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ ये अंतर-क्षेत्रीय जुड़ाव एक लंबा रास्ता तय करेगा।

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज ने 20 करोड़ महिला जन धन खाता धारकों को प्रति माह 500 रुपये प्रदान किए हैं। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत 8 करोड़ गरीब परिवारों को मुफ्त गैस सिलेंडर प्रदान किया गया है, जिसने कुछ हद तक महिलाओं के लिए जीवन को आसान बनाया है।

महिला स्वयं-सहायता समूहों के लिए गिरवी मुक्त ऋण को 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये करना भी गरीब परिवारों की महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में उठाया गया एक छोटा कदम है।

हमें संकट के इस समय में सभी अवसरों का लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए और हम उम्मीद करते है कि हमारा समाज इस तथ्य की सराहना करना सीखेगा कि “शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व” ही हमारे जीवन में इस चरण के बाद सीखने लायक सबक है। भारतीय कारोबार जगत के लिए अब निर्णायक और कठोर कदम उठाने का समय आ गया है, जिसे “आत्मनिर्भर भारत अभियान” के साथ एक शुरुआत दे दी गई है। हमने कुछ प्रगति की है लेकिन अभी मीलों तक आगे जाना है।

कामना है कि हम और भी ज्यादा बुद्धि और विवेक के साथ इससे बाहर निकलें और आशा है कि इस लॉकडाउन के दौरान और आने वाले वक्त में हमारी बेटियों, बहनों, माताओं और देखभाल करने वाली महिलाओं को वो सारा समर्थन, शक्ति, सुरक्षा और संरक्षण मिले जो उन्हें मिलना बाकी है।

देबाश्री चौधरी
राज्य मंत्री
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय,
भारत सरकार.

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