बिहार में दूसरा एम्स, इलाज की जगी एक और आश

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कहावत है कि आवत जात,पनहिया टूटी। कुछ ऐसी ही स्थिति है बिहार में स्थापित होनेवाले दूसरे एम्स की।  बात छह वर्ष पहले की है। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी की सरकार ने देश में पांच राज्यों में पांच और एम्स बनाने के लिए बजट में घोषणा की। बिहार के हिस्से पटना के बाद एक दूसरा एम्स मिला।  लोगों को उम्मीद जगी कि मरीज जल्द ही इसका लाभ उठायेंगे।  स्थिति यह है कि छह वर्ष तो इस बात को तय करने में लग गया कि बिहार में एम्स किस शहर में बनेगा? उसकी जमीन कहां मिलेगी?

जिलाधिकारी कक्ष में उपस्थित एम्स निदेशक

केंद्र सरकार राज्य को एम्स बनाने को लेकर जमीन के बारे में पत्र लिखती रही। इधर बिहार सरकार कहती कि आपको किस शहर में एम्स बनाना है? बिहार में एम्स बनाने के लिए दो साल पहले जमीन दरभंगा के  डीएमसीएच में मिल गयी। एम्स के लिए 200 एकड़ जमीन की आवश्यकता है। इधर राज्य सरकार ने डीएमसीएच की जमीन से एक टुकड़ा काटकर 81 एकड़ जमीन एम्स को दे दी. दरभंगा के जिलाधिकारी राजीव रौशन की उपस्थिति में यह काम संपन्न हुआ। डीएमसीएच के प्रिंसिपल डा कृपा नाथ मिश्र ने जमीन का दस्तावेज एम्स के निदेशक डा माधवानंद कार को सौंप दिया। अब जमीन मिलने के बाद की कहानी शुरू होनी है।
कहानी पटना एम्स की
पटना एम्स की नींव जनवरी 2004 में रखी गयी थी। तत्कालीन उपराष्ट्रपति स्व भैरो सिंह शेखावत ने इसकी नींव रखी थी. बिहार के हिस्से में मिले इस एम्स ने कोर्ट कचहरियों का चक्कर लगाते हुए अपना काम वर्ष 2012 में आरंभ किया। आज भी पटना एम्स में इलाज की बेहतर व्यवस्था है। हालांकि यहां पर इलाज की लंबी कतारें लगती है। दरभंगा में स्थापित होनेवाले एम्स के लिए अभी 120 एकड़ जमीन की आ‌वश्यकता है। उससे अधिक चुनौती है उसके निर्माण कार्य में। एम्स के निर्माण दो स्तर पर एक साथ होता है। पहला प्रशासनिक भवन, कॉलेज भवन, छात्रावास भवन, स्टाफ क्वाटर और दूसरा है अस्पताल का निर्माण जहां मरीजों को भर्ती कर इलाज किया जाता है.

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