संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) का 79वां सत्र इस बार दुनिया भर में जारी भीषण संघर्षों और कूटनीतिक तनावों के साये में संपन्न हुआ। न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में जब दुनिया भर के दिग्गज नेता एक-दूसरे के भाषणों के बहिष्कार और तीखी बयानबाजी में व्यस्त थे, तब नेपाल के बालेन शाह के संबोधन ने पूरी महासभा का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। उनके भाषण के दौरान हॉल में मौजूद प्रतिनिधियों ने न केवल उन्हें सुना, बल्कि उनके शब्दों पर जोरदार तालियां बजाकर उनका समर्थन भी किया।
अपने संबोधन में बालेन शाह ने वैश्विक राजनीति की कड़वी सच्चाई को उजागर किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दुनिया भर में चल रहे खूनी युद्ध न केवल संसाधनों की बर्बादी हैं, बल्कि ये मानवता के भविष्य को अंधकार में धकेल रहे हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इन युद्धों का फैसला चाहे सत्ता के गलियारों में लिया जाता हो, लेकिन इनकी भारी कीमत आम नागरिक, गरीब और मासूम बच्चे चुका रहे हैं।
युद्धों की विभीषिका और आम आदमी का दर्द
बालेन शाह ने अपने भाषण के दौरान इस बात को प्रमुखता से उठाया कि आज की वैश्विक व्यवस्था में शांति की अपील केवल कागजों तक सीमित रह गई है। उन्होंने कहा कि जब शक्तिशाली देश अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ते हैं, तो उसका खामियाजा उन देशों को भुगतना पड़ता है जिनका संघर्ष से कोई लेना-देना नहीं होता। उन्होंने वैश्विक नेताओं को आईना दिखाते हुए याद दिलाया कि इतिहास गवाह है कि युद्ध कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं रहे हैं।
महासभा के मंच से उन्होंने एक भावुक अपील की कि दुनिया को अब ‘युद्ध’ के बजाय ‘सहयोग’ की भाषा समझनी होगी। उन्होंने कहा कि आज के दौर में जब मानवता जलवायु परिवर्तन और आर्थिक अस्थिरता जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब देशों का आपस में लड़ना एक बड़ी आत्मघाती भूल है। उनके इन शब्दों ने वहां मौजूद कई देशों के प्रतिनिधियों को सोचने पर मजबूर कर दिया जो खुद किसी न किसी तरह के तनाव के दौर से गुजर रहे हैं।
भोटेकोशी-त्रिशूली आपदा: दुनिया के लिए एक चेतावनी
भाषण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नेपाल में हाल ही में आई भोटेकोशी और त्रिशूली आपदा पर केंद्रित था। बालेन शाह ने इसे केवल एक स्थानीय प्राकृतिक आपदा मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने इसे पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चेतावनी करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि जलवायु परिवर्तन के कारण जिस तरह से हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति बदल रही है, वह आने वाले समय में पूरी मानवता के लिए एक बड़ा संकट बन सकता है।
उन्होंने कहा कि भोटेकोशी और त्रिशूली की घटनाएं यह बताती हैं कि प्रकृति के साथ किया गया खिलवाड़ अब अपनी सीमा पार कर चुका है। यदि दुनिया ने अभी भी अपनी विकास नीतियों और पर्यावरण के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव नहीं किया, तो ऐसी आपदाएं और अधिक भयानक रूप में सामने आएंगी। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आग्रह किया कि वे हिमालयी देशों की सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन में अधिक सक्रिय भूमिका निभाएं, क्योंकि हिमालय की रक्षा का मतलब पूरी दुनिया की जल सुरक्षा की रक्षा है।
भारत का आभार और वैश्विक एकजुटता की अपील
अपने भाषण के अंत में बालेन शाह ने भारत के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया। उन्होंने आपदा के समय भारत द्वारा दिए गए सहयोग और पड़ोसी धर्म निभाने की सराहना की। उन्होंने कहा कि कठिन समय में भारत का साथ नेपाल की जनता के लिए एक बड़ी राहत बनकर आया है। भारत के प्रति यह आभार जताकर उन्होंने यह संदेश दिया कि दक्षिण एशिया में सहयोग और आपसी विश्वास ही विकास का एकमात्र रास्ता है।
बालेन शाह ने अपने समापन में एक बार फिर शांति की वकालत की। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र का मंच आपसी विवादों को सुलझाने के लिए है, न कि उन्हें और अधिक हवा देने के लिए। उन्होंने सभी सदस्य देशों से आह्वान किया कि वे अपने निजी हितों से ऊपर उठकर एक ऐसी दुनिया के निर्माण में योगदान दें, जहाँ युद्धों का नामोनिशान न हो। महासभा में उनकी यह स्पष्टवादिता और मानवतावादी दृष्टिकोण आने वाले समय में नेपाल की विदेश नीति के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।

