बिहार के 35 जिलों में कुल 5777 मठ-मंदिर और उनसे जुड़ी लगभग 28,672 एकड़ भूमि दर्ज की गयी है. इनमें 2499 पंजीकृत और 2512 गैर-पंजीकृत मठ-मंदिर शामिल हैं. उपलब्ध आंकड़ों से यह भी संकेत मिलता है कि बड़ी संख्या में धार्मिक परिसंपत्तियां अभी तक पूर्ण रूप से औपचारिक निगरानी व्यवस्था के दायरे में नहीं हैं.

आंकड़ों के अनुसार भूमि के मामले में कुछ जिले विशेष रूप से सामने आते हैं. मोतिहारी में लगभग 5874 एकड़, मधुबनी में 2385 एकड़, सीतामढ़ी में 2025 एकड़ और कैमूर में करीब 1469 एकड़ धार्मिक परिसंपत्तियां दर्ज हैं. वहीं वैशाली में मठ-मंदिरों की संख्या सबसे अधिक 517 बतायी गयी है.

सुरक्षा के नजरिये से क्या हैं बड़े सवाल

इतनी बड़ी मात्रा में धार्मिक भूमि और परिसंपत्तियों का होना कई प्रशासनिक और सुरक्षा चुनौतियां भी खड़ी करता है.

1. अतिक्रमण का खतरा
गैर-पंजीकृत मठ-मंदिरों की संख्या अधिक होने का मतलब है कि कई परिसंपत्तियों का स्पष्ट रिकॉर्ड, सीमांकन और कानूनी दस्तावेजीकरण नहीं हो सकता. ऐसे मामलों में भूमि विवाद और अतिक्रमण की संभावना बढ़ जाती है.

2. अवैध हस्तांतरण और प्रबंधन संकट
जहां संस्थागत निगरानी कमजोर होती है, वहां जमीन के गलत उपयोग, अवैध लीज या निजी लाभ के लिए उपयोग का खतरा बढ़ जाता है.

3. आपदा और संरचनात्मक सुरक्षा
कई पुराने मठ-मंदिर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकते हैं. यदि उनका नियमित ऑडिट, संरचनात्मक जांच और डिजिटल रिकॉर्ड नहीं हो तो दुर्घटना या क्षति का जोखिम बढ़ सकता है.

4. डिजिटल रिकॉर्डिंग की जरूरत
इतनी बड़ी परिसंपत्ति के लिए GIS मैपिंग, ऑनलाइन भूमि रजिस्टर, ड्रोन सर्वे और सार्वजनिक डैशबोर्ड जैसी व्यवस्था पारदर्शिता बढ़ा सकती है.

उपयोगिता के नजरिये से क्या हो सकता है लाभ

धार्मिक परिसंपत्तियों को सिर्फ जमीन के रूप में देखने के बजाय सामाजिक संपत्ति के रूप में भी देखा जा सकता है.

धार्मिक पर्यटन का विकास
गया, वैशाली, मधुबनी, पटना और कैमूर जैसे जिलों में धार्मिक पर्यटन के साथ स्थानीय रोजगार बढ़ाया जा सकता है.

सामुदायिक उपयोग
जहां कानूनी रूप से संभव हो, वहां शिक्षा, संस्कृत अध्ययन, गौशाला, सामुदायिक स्वास्थ्य शिविर और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए परिसंपत्तियों का उपयोग किया जा सकता है.

स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा
यदि परिसंपत्तियों का पारदर्शी प्रबंधन हो तो इससे स्थानीय रोजगार, छोटे व्यवसाय और धार्मिक आयोजनों से आय सृजन संभव है.

निष्कर्ष

35 जिलों के आंकड़े बताते हैं कि बिहार के मठ-मंदिर केवल धार्मिक संस्थान नहीं बल्कि एक बड़े सामाजिक और आर्थिक संसाधन भी हैं. लेकिन इस संपत्ति का वास्तविक लाभ तभी संभव है जब पंजीकरण, सुरक्षा, पारदर्शिता और उपयोग के बीच संतुलन बनाया जाए. धार्मिक आस्था की रक्षा के साथ परिसंपत्तियों का जवाबदेह प्रबंधन आने वाले समय की बड़ी जरूरत बन सकता है.

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