बिहार की राजनीति में जमुई यौन उत्पीड़न मामले को लेकर एक नया और गंभीर मोड़ आ गया है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल 28 सितंबर 2026 को बिहार राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग और बिहार राज्य महिला आयोग पहुंचा। इस प्रतिनिधिमंडल ने आयोग के अध्यक्षों से मुलाकात कर बिहार के मुख्यमंत्री के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। मामला जमुई में हुई एक नाबालिग पीड़िता के यौन उत्पीड़न से जुड़ा है, जिसकी पहचान उजागर करने का आरोप मुख्यमंत्री पर लगा है।

कानून का उल्लंघन और संवैधानिक गरिमा का सवाल

राजद नेताओं का आरोप है कि मुख्यमंत्री ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट्स—जैसे फेसबुक, थ्रेड और एक्स (पूर्व में ट्विटर)—पर जमुई की नाबालिग यौन उत्पीड़न पीड़िता की तस्वीर साझा की। यह कृत्य सीधे तौर पर पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) और किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act) का घोर उल्लंघन है। प्रतिनिधिमंडल ने सवाल उठाया है कि यदि राज्य का मुखिया और संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ही कानून का मखौल उड़ाएगा, तो आम जनता के बीच कानून का क्या डर और औचित्य रह जाएगा?

आश्चर्य और दुख की बात यह है कि इस कृत्य की देश भर में आलोचना होने के बावजूद, अब तक मुख्यमंत्री की ओर से कोई खेद या माफीनामा सामने नहीं आया है। प्रतिनिधिमंडल ने इस बात पर जोर दिया कि बिहार पुलिस और संबंधित विधि नियामक एजेंसियां इस पूरे मामले में चुप्पी साधे हुए हैं, जो कि न्याय व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है। कानून के सामने सभी बराबर हैं, फिर चाहे वह कोई भी हो, और यही मांग लेकर राजद के नेता आयोग पहुंचे थे।

कानूनी धाराओं का हवाला और उच्चतम न्यायालय का निर्देश

ज्ञापन में स्पष्ट रूप से उन धाराओं का उल्लेख किया गया है जिनके तहत मुख्यमंत्री पर कार्रवाई होनी चाहिए। इसमें पॉक्सो अधिनियम 2012 की धारा 23(2) और 23(4), किशोर न्याय अधिनियम 2015 की धारा 74(1) और 74(3), तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 72(1) शामिल हैं। ये कानून स्पष्ट करते हैं कि नाबालिग पीड़ितों की पहचान गुप्त रखना अनिवार्य है ताकि समाज में उनके भविष्य और सुरक्षा पर कोई आंच न आए।

बता दें कि माननीय उच्चतम न्यायालय ने ‘निपुण सक्सेना बनाम भारत संघ’ (रिट याचिका संख्या 565/2012) के अपने ऐतिहासिक आदेश में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए थे। 5 दिसंबर 2018 के इस आदेश में कोर्ट ने कहा था कि किसी भी यौन उत्पीड़न पीड़िता का नाम, पता, फोटो या ऐसी कोई भी जानकारी जिससे उसकी पहचान उजागर हो सके, उसे किसी भी मीडिया या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित करना दंडनीय अपराध है। राजद का तर्क है कि मुख्यमंत्री द्वारा किया गया यह कार्य सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों का उल्लंघन है, जिसके लिए तत्काल प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए।

प्रतिनिधिमंडल में शामिल प्रमुख चेहरे

बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष डॉ. अमरदीप से मिलने वाले दल में डॉ. अनवर आलम, पूर्व विधायक डॉ. एज्या यादव, चित्तरंजन गगन, डॉ. चक्रपाणि हिमांशु, मदन शर्मा और निर्भय अम्बेडकर शामिल थे। वहीं, महिला आयोग की अध्यक्ष अप्सरा से मुलाकात करने वाले प्रतिनिधिमंडल में श्रीमती मधु मंजरी, श्रीमती आभा लता, श्रीमती प्रो. गीता यादव, रबिया खातुन, श्रीमती सुनीता कुशवाहा, श्रीमती विजय लक्ष्मी, श्रीमती प्रभावती देवी मांझी और सुश्री अर्चना कुमारी मौजूद थीं। इन सभी नेताओं ने एक स्वर में मांग की है कि आयोग इस मामले को गंभीरता से ले और संवैधानिक मर्यादाओं की रक्षा सुनिश्चित करे।

यह मामला अब बिहार की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। विपक्षी दल इसे सरकार की संवेदनहीनता के रूप में देख रहे हैं। अब देखना यह होगा कि बाल अधिकार संरक्षण आयोग और महिला आयोग इस ज्ञापन पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या आने वाले समय में राज्य के मुखिया के खिलाफ कोई ठोस कानूनी प्रक्रिया शुरू की जाती है। आम जनता की नजरें भी अब इन आयोगों की निष्पक्षता पर टिकी हुई हैं।

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