बिहार में आपदा प्रबंधन की दिशा में एक बड़ा तकनीकी कदम उठाया गया है। हाल ही में एम्स पटना में ‘भीष्म क्यूब’ (BHISHM Cube) का सफल निरीक्षण किया गया, जो भविष्य में किसी भी बड़ी आपदा या सामूहिक दुर्घटना के समय गेम-चेंजर साबित हो सकता है। बिहार के आपदा प्रबंधन मंत्री रत्नेश सादा ने एम्स पटना पहुंचकर इस अनूठी चिकित्सा व्यवस्था का जायजा लिया और आपदा के दौरान इसकी कार्यप्रणाली को बारीकी से समझा।

कल्पना कीजिए कि किसी क्षेत्र में अचानक भूकंप आ जाए, भीषण बाढ़ की स्थिति बन जाए, या फिर कोई बड़ा सड़क हादसा हो जाए जिसमें दर्जनों लोग घायल हों। ऐसे समय में सबसे बड़ी चुनौती घायलों को अस्पताल तक पहुँचाना होती है, क्योंकि सड़क संपर्क टूटने या एम्बुलेंस की कमी के कारण अक्सर कीमती समय बर्बाद हो जाता है। भीष्म क्यूब इसी समस्या का एक अत्याधुनिक समाधान है, जो अस्पताल के पहुँचने का इंतज़ार करने के बजाय, खुद आपदा स्थल पर पहुँचकर ‘गोल्डन ऑवर’ में मरीजों को जीवन रक्षक उपचार प्रदान करने की क्षमता रखता है।

क्या है भीष्म क्यूब और यह कैसे करता है काम?

भीष्म क्यूब असल में एक पोर्टेबल अस्पताल की तरह है जिसे बहुत कम समय में आपदा प्रभावित क्षेत्र में तैनात किया जा सकता है। एम्स पटना के ट्रॉमा एंड इमरजेंसी विभागाध्यक्ष और भीष्म क्यूब के नोडल अधिकारी डॉ. अनिल कुमार ने मंत्री को विस्तार से समझाया कि यह तकनीक कैसे काम करती है। इसमें अत्याधुनिक चिकित्सा उपकरण, दवाइयाँ और सर्जरी तक की सुविधा मौजूद होती है, जिसे किसी भी दुर्गम इलाके में ले जाना आसान है।

यह व्यवस्था विशेष रूप से सामूहिक दुर्घटनाओं (Mass Casualty Incidents) के लिए डिज़ाइन की गई है। जब अस्पतालों पर मरीजों का अत्यधिक दबाव होता है, तब यह क्यूब एक मिनी-अस्पताल के रूप में काम करता है। इसमें मौजूद सेंसर, मॉनिटर और अन्य उपकरण डॉक्टर को मौके पर ही मरीजों की स्थिति का सटीक आकलन करने में मदद करते हैं, जिससे प्राथमिक उपचार (First Aid) की गुणवत्ता में सुधार आता है।

बिहार के लिए क्यों है यह तकनीक इतनी महत्वपूर्ण?

बिहार भौगोलिक दृष्टि से एक ऐसा राज्य है जहाँ बाढ़, भूकंप और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा हमेशा बना रहता है। राज्य का आपदा प्रबंधन विभाग लगातार ऐसी रणनीतियों पर काम कर रहा है जो आपदा के जोखिम को कम कर सकें और प्रतिक्रिया समय (Response Time) को बेहतर बना सकें। ऐसे में भीष्म क्यूब का निरीक्षण मात्र एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक भविष्योन्मुखी पहल है।

मंत्री रत्नेश सादा ने इस दौरान चिकित्सा सेवाओं को और अधिक सुदृढ़ बनाने पर जोर दिया। एम्स पटना, जहाँ पहले से ही 24 घंटे ट्रॉमा और इमरजेंसी सेवाएँ उपलब्ध हैं, अब भीष्म क्यूब के माध्यम से अपनी पहुँच को और अधिक व्यापक बनाने की तैयारी में है। इस निरीक्षण के दौरान एम्स पटना के कार्यकारी निदेशक एवं सीईओ प्रो. (ब्रिगेडियर) डॉ. राजू अग्रवाल और चिकित्सा अधीक्षक प्रो. डॉ. प्रशांत कुमार सिंह सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे, जो इस तकनीक के सफल क्रियान्वयन को लेकर काफी उत्साहित दिखे।

आपदा प्रबंधन का बदलता स्वरूप

आने वाले समय में आपदा प्रबंधन का पूरा दारोमदार तकनीक और त्वरित प्रतिक्रिया पर टिका होगा। भीष्म क्यूब जैसी व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि यदि अस्पताल तक पहुँचना संभव नहीं है, तो अस्पताल खुद मरीज के पास पहुँचे। यह न केवल जान बचाने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह आपदा के बाद होने वाली अव्यवस्था को भी नियंत्रित करने में सक्षम है।

बिहार सरकार और एम्स पटना का यह साझा प्रयास आपदा प्रबंधन में एक नई इबारत लिख सकता है। यदि इस तकनीक को राज्य के अन्य जिलों और दुर्गम क्षेत्रों में भी लागू किया जाता है, तो यह निश्चित रूप से आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं में एक बड़ी क्रांति लाएगा। अब देखना यह होगा कि इस पायलट प्रोजेक्ट के बाद सरकार इसे बड़े पैमाने पर कैसे धरातल पर उतारती है।

अंततः, किसी भी बड़ी दुर्घटना में हर एक सेकंड कीमती होता है। भीष्म क्यूब यह सुनिश्चित करता है कि घायलों को इलाज के लिए घंटों तक एम्बुलेंस का इंतज़ार न करना पड़े। यह तकनीक चिकित्सा विज्ञान और आपदा प्रबंधन के मेल का एक बेहतरीन उदाहरण है, जो आने वाले वर्षों में हजारों लोगों की जान बचाने का आधार बनेगी।

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