05 जनवरी 2025,पटना

बिहार के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में हिंदी में एमबीबीएस कोर्स चलाने का विकल्प विद्यार्थियों को दिया गया। विद्यार्थियों को विकल्प तो दिया गया लेकिन इसमें पढञनेवाले  छात्र नहीं मिले। आखिर क्यों नहीं बन पा रहा है हिंदी मेडिकल शिक्षा की राह आसान?

ग्रामीण पृष्ठभूमि से आनेवाले विद्यार्थियों को मेडिकल शिक्षा में भाषा की बाधा से मुक्त करने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया। मध्यप्रदेश के बाद बिहार देश का दूसरा ऐसा राज्य बना, जहां एमबीबीएस की पढाई हिंदी में कराने का विकल्प शुरू किया गया। लेकिन सरकार की इस पहल को विद्यार्थियों का अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया। वर्ष 2024 से पूरी तैयारी के बावजूद राज्य के किसी भी मेडिकल कॉलेज में हिंदी माध्यम से पढ़ने को तैयार छात्र सामने नहीं आये हैं।

स्वास्थ्य विभाग ने करायी पूरी तैयारी

स्वास्त्य विभाग ने हिंदी में एमबीबीएस पढ़ाने के लिए पूरा सिलेबस, पुस्तकों का चयन और शेक्षणिक ढांचा तैयार कर लिया है। 2024 से दाखिले के समय छात्रों से यह विकल्प भी पूछा जा रहा है कि वे हिंदी या अंग्रेजी में पढ़ाई और परीक्षा देना चाहते हैं। इसके बावजूद किसी भी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक भी छात्र हिंदी माध्यम को नहीं चुना।

विश्वविद्यालय भी दे रहा है विकल्प

स्थिति यह है कि बिहार स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय 2024 से लगातार विद्यार्थियों को यह विकल्प दे रहा है, लेकिन रुची शून्य बनी हुई है। प्रथम एमबीबीएस 2024 की विश्वविद्यालय परीक्षा में सभी प्रश्न हिंदी और अंग्रेजी-दोनों भाषाओं में पूछे गये थे। छात्रों को अपनी पसंद की भाषा में उत्तर लिखने की पूरी छूट थी, फिर भी किसी ने हिंदी को प्राथमिकता नहीं दी।

एमबीबीएस छात्र प्रियांशु का जवाब

एमबीबीएस  कर रहे छात्र प्रियांशु रंजन का कहना है कि हिंदी में उत्तर लिखना व्यवहारिक रूप से असहज लगता है। मेडिकल की पढ़ाई में प्रयुक्त अधिसंख्य शब्द, अवधारणाएं और रेफरेंस सामग्री वर्षों से अंग्रेजी में ही उपलब्ध है। हिंदी में सभी विषयों की मानक पुस्तकें अभी बाजाार में आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, जिससे छात्रों को तैयारी में कठिनाई महसूस होती है।

पीएमसीएच प्रिंसिपल डा कौशल किशोर ने बताया

वहीं, पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल के प्राचार्य डा कौशल किशोर बताते हैं कि कॉलेज को अब तक हिंदी माध्यम से पढ़ाई को लेकर न तो कोई आवेदन मिला है और नहीं किसी छात्र ने औपचारिक जिज्ञासा  दिखाई है। उनका कहना है कि यदि छात्र सामने आते हैं तो कॉलेज की ओर से पढ़ाई और पुस्तकों की व्यवस्था की जायेगी।

विशेषज्ञों की राय :

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या केवल भाषा की नहीं, बल्कि मेडिकल इकोसिस्टम की आदतों और भविष्य की संभावनाओं से भी जुड़ी हैं। पीजी प्रवेश, राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएं, रिसर्च जर्नल और क्लिनिकल प्रैक्टिस – सबका आधार आज भी अंग्रेजी है। ऐसे में छात्र जोखिम लेने से बच रहे हैं।

निष्कर्ष :

हिंदी में एमबीबीएस की पहल अपने आप में ऐतिहासिक है, लेकिन इसे सफल बनाने के लिए मानक हिंदी मेडिकल पुस्तकें, शब्दावली का एकरूप ढांचा, और करियर को लेकर स्पष्ट रोडमैप जरूरी होगा। जब तक ये सवाल हल नहीं होते, तब तक हिंदी मेडिकल शिक्षा का सपना कागजों तक ही सीमित हने की आशंका बनी रहेगी।

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