04 जनवरी 2026, पटना
बिहार के गांवों में एक बार फिर वही सवाल गूंजने लगा है। इस बार मुखिया कौन बनेगा? पंचायत चुनाव इस साल के अंत में होनेवाला है। ग्राम पंचायत 2026 का चुनाव खास होनेवाला है। यह तय करेगा कि किस पंचायत की तस्वीर अगले पांच सालों में बदलनेवाली है। किस गांव की सड़क बनेगी या नहीं, नल से हर घर में पानी आयेगा या सिर्फ फाइले में योजना सिमट कर रह जायेगी। गांव के गरीबों को एक वोट की कीमत के एवज में उनके पास कितनी योजनाएं पहुंचायी जायेगी।
पिछले पंचायत चुनाव को बीते करीब चार साल से अधिक हो गया है। इस दौरान गांवों में कुछ सड़के बनी, कहीं नल जल पहुंचा, तो कहीं अब भी लोग अपने घरों के हैंड पाइप से काम चला रहे हैं। वर्ष 2026 का ग्राम पंचायत चुनाव इन सवालों का जवाब मांग रहा है -काम के नाम पर वोट या जाति-पैसे के दम पर सत्ता मिलेगी?
सबसे नजदीक की सरकार, सबसे ज्यादा असर
पंचायत व्यवस्था को लोकतंत्र की जड़ कहा जाता है। मुखिया, पंच, पंचायत समिति सदस्य, प्रमुख, जिला परिषद सदस्य और जिला परिषद अध्यक्ष वहीं लोग हैं जिनके दरवाजे पर गांव का आम आदमी सबसे पहले दस्तक देता है। राशन कार्ड बनाने, वंशावली बनाने, प्रधानमंत्री आवास, वृद्धा पेंशन से लेकर पक्की नाली-गली तक- सब कुछ पंचायत के दायरे में आता है। क्या गांव की विधवाओं को पेंशन मिल रहा है। रोजगार के साधन कौन से पैदा हो रहे हैं। सरकार ने बेरोजगारी दूर करने से लिए मनरेगा जैसी रोजगार गारंटी योजना का लाभ मिल रहा है।
काम के रिपोर्ट कार्ड लेने का समय
पिछले चार सालों में सरकार ने कई योजनाओं को गांव वालों के लिए दिल्ली और पटना से भेजी गयी। सरकारी रिकार्ड में सभी योजनाओं का लाभ जनता को मिल गया है। हर पंचायत के सभी वार्ड में सोलर स्ट्रीट लाइट लगायी जानी है। हर वार्ड में 10-10 सोलर स्ट्रीट लाइट लगाया जाना है। हर ग्राम पंचायत में पंचायत सरकार भवन का निर्माण कराया जाना है। हर घर को पक्की नाली-गली से जोड़ना है। इतना ही नहीं हर घर में पीने के पानी के लिए नल का जल उपलब्ध कराना है। सरकार ने खुले से शौच से मुक्ति को लेकर बड़ा अभियान चलाया। क्या ग्राम पंचायत खुले में शौच से मुक्त हो गया है। क्या गांव की सड़को के किनारे लोग शौच नहीं करते हैं।
इस बार चुनाव में क्या बदलेगा ?
2026 के पंचायत चुनाव में कुछ स्थितियां सामने हैं। इस चुनाव में युवा मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। महिलाओं की भागीदारी पहले से अधिक बढ़ी है। पंचायत चुनाव भले ही दलीय आधार पर नहीं हो, लेकिन जाति की राजनीति यहां पूरी ताकत से मौजूद रहती है। किस टोले में किस जाति के वोट ज्यादा हैं, किस परिवार की पकड़ मजबूत है-इसी गणित पर उम्मीदवार तय होते हैं। हालांकि युवा वोटर इस गणित को थोड़ा चुनौती देते दिखेंगे। यह सवाल जरूर पूछा जायेगा कि पिछली बार जिसकों दिया, उसने क्या किया?

