07 जनवरी 2026, पटना
बिहार में पंचायत चुनाव 2026 का समय जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है, गांव-गांव में चुनावी सरगर्मी भी तेज होती जा रही है। संभावित उम्मीदवारों से लेकर राजनीतिक दलों तक, हर किसी की नजर एक सवाल पर टिकी है- कौन सी सीट किस वर्ग और किस जेंडर के लिए आरक्षित होगी। दरअसल बिहार की त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था में आरक्षण ही चुनाव की रणनीतिक की धुरी है। इसी के आधार पर तय होता है कि कौन मैदान में उतरेगा और कौन बाहर बैठकर समीकरण साधेगा।
बिहार की पंचायतों में आरक्षण का गणित: लोकतंत्र में हिस्सेदारी का फार्मूली
बिहार की त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था में ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद – सिर्फ स्थानीय शासन की इकाइयां नहीं हैं, बल्कि सामाजिक न्याय और समावेशी लोकतंत्र की प्रयोगशाला भी है। यहां चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि यह तय करने का माध्यम है कि सत्ता में किनकी हिस्सेदारी होगी और किन तबकों की आवाज पंचायत सरकार भवन तक पहुंचेगी। इसी के संदर्भ में पंचायत चुनावों में लागू आरक्षण का फार्मूला बेहद अहम हो जाता है।
त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था क्या है?
बिहार में पंचायत राज व्यवस्था संविधान के 73 वें संशोधन के तहत दिया गया है। इसके तीन स्तर हैं-
- ग्राम पंचाय – मुखिया और वार्ड सदस्य
- पंचायत समिति – (प्रखंड स्तर)- प्रमुख
- जिला परिषद – जिला परिषद अध्यक्ष
इन तीनों स्तरों पर चुनाव प्रत्यक्ष मतदान से होता है और सभी पदों पर आरक्षण लागू है। प्रमुख और जिला परिषद अध्यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष ( निर्वाचित सदस्यों के द्वारा किया जाता है)।
आरक्षण का आधार और फार्मूला
बिहार की पंचायतों में आरक्षण का प्रावधान मुख्य रूप से तीन आधार पर दिया जाता है-
अनुसूचित जाति(एससी)
अनुसूचित जनजाति (एसटी)
अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी)
महिलाएं (सभी वर्गों में 50 प्रतिशत)
बिहार में आरक्षण का क्रियान्वयन बिहार पंचायत राज अधिनियम 2006 और उसके संसोधनों के तहत होता है।
आरक्षण तय करने का फार्मूला क्या है ?
जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण – किसी पंचायत, प्रखंड जिले में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अत्यंत पिछड़ा वर्ग की जनसंख्या के प्रतिशत के आधार पर सीटें आरक्षित होती हैं.
उदाहरण के लिए,यदि किसी ग्राम पंचायत में अनुसूचित जाति की आबादी 30 प्रतिशत है, तो उस पंचायत के लगभग 31 प्रतिशत पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होंगे। यह आंकड़े नवीनतम जनगणना (वर्तमान में 2011 ) पर आधारित है। इसी तरह से अनुसूचित जनजाति की आबादी अगर 10 प्रतिशत है तो उसको भी 10 प्रतिशद पद उस वर्ग के लिए आरक्षित होंगे। चुंकि आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत के अंदर रखना है। ऐसे में शेष पदों पर अत्यंत पिछड़ा वर्ग को आरक्षण मिलेगा. अत्यंत पिछड़ा वर्ग को अधिकतम 20 प्रतिशत ही आरक्षण दिया जाता है। इसके आलावा सभी वर्ग के आरक्षित पदों में 50 प्रतिशत पद उसी वर्ग की महिलाओं को दिया जायेगा। यानी एससी वर्ग की महिला को एससी सीटों में तो एसटी वर्ग की सीटों में एसटी वर्ग की महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण मिलता है।

