बिहार की राजनीति में नया संवैधानिक सवाल, सोमवार को नामांकन

पटना, 7 जून — बिहार की राजनीति में मंत्री पद को लेकर अब संवैधानिक बहस तेज हो गई है। राज्य सरकार में पंचायती राज मंत्री के रूप में दीपक प्रकाश की दोबारा नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) के जरिए चुनौती दी गयी है। याचिका में सवाल उठाया गया है कि क्या कोई व्यक्ति बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने, छह महीने की संवैधानिक सीमा पूरी होने के बाद दोबारा मंत्री बनाया जा सकता है।

क्या है प्रावधान

याचिका दायर करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह ने संविधान के अनुच्छेद 164(4) का हवाला देते हुए कहा है कि यह प्रावधान किसी गैर-विधायक को केवल छह महीने तक मंत्री बने रहने की अनुमति देता है। इस अवधि के भीतर उसे विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना अनिवार्य होता है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि पहली नियुक्ति के आधार पर छह महीने की अधिकतम अवधि 20 मई 2026 को समाप्त हो चुकी थी। ऐसे में दोबारा मंत्री पद देना संविधान की भावना के विपरीत है और इसे संवैधानिक छूट को बढ़ाने का अप्रत्यक्ष तरीका माना जाना चाहिए।

PIL में यह भी कहा गया है कि अगर सरकारें बदलने या इस्तीफे के आधार पर बिना निर्वाचित हुए बार-बार मंत्री बनने की अनुमति दी जाती है, तो इससे संसदीय लोकतंत्र, जनप्रतिनिधित्व और जवाबदेही की मूल अवधारणा प्रभावित होगी।

दो सरकारों में बने मंत्री

दीपक प्रकाश ने 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री पद की शपथ ली थी। उस समय भी वे विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं थे। बाद में 15 अप्रैल 2026 को सरकार के इस्तीफे के साथ उनका मंत्री पद समाप्त हो गया। इसके बाद करीब 222 दिनों के अंतराल की संवैधानिक गणना को लेकर विवाद खड़ा हुआ और 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी सरकार में उन्हें फिर से पंचायती राज मंत्री बना दिया गया।

क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित SR चौधरी बनाम पंजाब राज्य (2001) फैसले का भी उल्लेख किया गया है। उस फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि कोई व्यक्ति छह महीने की अवधि पूरी होने से पहले इस्तीफा देकर फिर से मंत्री पद हासिल कर संवैधानिक व्यवस्था को दरकिनार नहीं कर सकता।

अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर राजनीतिक और संवैधानिक विशेषज्ञों की नजरें टिक गयी हैं। फैसला सिर्फ एक मंत्री के पद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में गैर-विधायकों को मंत्री बनाए जाने की प्रक्रिया पर भी असर डाल सकता है।

इधर राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की भी है कि सोमवार, 8 जून को नामांकन की अंतिम तिथि तय होने के बीच यह मामला और अधिक राजनीतिक महत्व हासिल कर सकता है।

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